महात्मा बुद्ध का जीवन परिचय और उनके उपदेश | History Class 12 JAC Board Ranch | Mahatma Buddh

Mahatma Buddh: भारत की धरती ज्ञान, अध्यात्म और महान संतों की भूमि रही है। इन्हीं महान विभूतियों में एक नाम है महात्मा बुद्ध (Gautam Buddha), जिन्होंने संसार को दुःखों से मुक्ति और शांति का मार्ग दिखाया। उनका जीवन संघर्षमय, प्रेरणादायक और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण था। उनके सरल उपदेश आज भी करोड़ों लोगों के लिए मार्गदर्शक हैं।

प्रस्तावना

बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध केवल एक धार्मिक नेता ही नहीं, बल्कि महान दार्शनिक, समाज सुधारक और जीवन-पथ प्रदर्शक भी थे। उन्होंने बाहरी आडंबरों के बजाय मन की शांति, करुणा, अहिंसा और मध्यम मार्ग को ही सार्थक जीवन का आधार माना। उनका संदेश समय, समाज और सीमा से परे है। यही कारण है कि आज विश्व के अनेक देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार है।

Mahatma Buddh का जन्म

  • जन्म नाम: सिद्धार्थ गौतम
  • जन्म: 563 ईसा पूर्व (लगभग)
  • जन्म स्थान: लुंबिनी (आज का नेपाल)
  • पिता: शुद्धोधन (शाक्य वंश के राजा)
  • माता: माया देवी

कहा जाता है कि सिद्धार्थ के जन्म के समय माता माया नैसर्गिक प्रक्रिया के लिए लुंबिनी वन में थीं, वहीं एक सल वृक्ष के नीचे उनका जन्म हुआ। उनके जन्म के सातवें दिन ही माता का देहांत हो गया, जिसके बाद पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी उनकी मौसी महाप्रजापति गौतमी ने उठाई।

राजमहल का जीवन

राजकुमार सिद्धार्थ का बचपन अत्यंत सुख-सुविधाओं में बीत रहा था। पिता शुद्धोधन चाहते थे कि सिद्धार्थ दुनिया के दुखों से अछूते रहें। इसलिए महल में कभी भी रोग, मृत्यु या वृद्धावस्था जैसी स्थितियों का दर्शन नहीं होने दिया जाता था।

लेकिन सत्य को कब तक छिपाया जा सकता है?

चार दृश्य (चार दर्शन) और वैराग्य

एक दिन रथ-सवारी के दौरान सिद्धार्थ ने चार दृश्य देखे—

  1. एक वृद्ध व्यक्ति
  2. एक रोगी
  3. एक मृत व्यक्ति
  4. एक संन्यासी

इन दृश्यों ने उनके मन को झकझोर दिया। उन्हें पहली बार जीवन के दुख, बीमारी, मृत्यु और मोक्ष के मार्ग का एहसास हुआ। यही अनुभव आगे चलकर उनके वैराग्य का कारण बना।

महल त्याग और ज्ञान की खोज

29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने रात में महल छोड़ दिया। पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को पीछे छोड़ते हुए उन्होंने मानव दुःखों के समाधान की खोज प्रारम्भ की। कठोर तप, साधना, गुरुओं का अनुसरण—सब कुछ किया, परंतु अंतर्मन को शांति नहीं मिली।

तब उन्होंने महसूस किया—अत्यधिक भोग और अत्यधिक तप दोनों ही मार्ग गलत हैं। सही मार्ग है “मध्यम मार्ग”।

बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्ति

उन्हें गहन साधना और ध्यान के लिए बोधगया (बिहार) उपयुक्त लगा। बोधि वृक्ष के नीचे लगातार 49 दिनों के ध्यान के बाद उन्हें पूर्ण ज्ञान (निर्वाण) प्राप्त हुआ। इसी क्षण से सिद्धार्थ “बुद्ध” कहलाए— अर्थात जागृत व्यक्ति

बुद्ध के उपदेश एवं दर्शन (Teachings of Buddha)

महात्मा बुद्ध ने अपना ज्ञान सबके लिए खोला, बिना किसी जाति, धर्म, ऊँच-नीच के भेदभाव के। उनके मुख्य सिद्धांत इस प्रकार हैं

1. चार आर्य सत्य (Four Noble Truths)

  1. दुःख है।
  2. दुःख का कारण तृष्णा (इच्छा) है।
  3. दुःख का निरोध संभव है।
  4. दुःख निरोध का मार्ग अष्ठांगिक मार्ग है।

2. अष्टांगिक मार्ग (Eightfold Path)

यह धर्म का व्यावहारिक मार्ग है—

क्रममार्ग
1.सम्यक दृष्टि
2.सम्यक संकल्प
3.सम्यक वाणी
4.सम्यक कर्म
5.सम्यक आजीविका
6.सम्यक प्रयास
7.सम्यक स्मृति
8.सम्यक समाधि

3. पंचशील (Five Precepts)

  • हत्या न करें
  • चोरी न करें
  • झूठ न बोलें
  • व्यभिचार न करें
  • मादक पदार्थों से दूर रहें

अन्य महत्वपूर्ण उपदेश

  • जीवन अनित्य है (सब नश्वर है)
  • क्रोध शत्रु है, करुणा धर्म है
  • इच्छाएँ ही दुख का मूल आधार
  • आत्म-चिंतन और ध्यान से मन शुद्ध होता है

उनका एक प्रसिद्ध वाक्य है—

“अप्प दीपो भव”
अर्थ: स्वयं अपना दीपक बनो।

धर्म प्रचार और महापरिनिर्वाण

ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने सारनाथ में प्रथम उपदेश दिया, जिसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है। 45 वर्षों तक वे भारत के विभिन्न भागों में घूम-घूमकर उपदेश देते रहे। 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में उनका महापरिनिर्वाण हुआ।

निष्कर्ष

महात्मा बुद्ध का जीवन हमें बताता है कि सच्ची शांति बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि मन के भीतर है। उन्होंने प्रेम, करुणा, बंधुत्व और मध्यम मार्ग पर चलकर दुनिया को एक नया दृष्टिकोण दिया। आज भी यदि हम उनके विचारों को अपनाएँ तो जीवन सरल, शांत और सुखी हो सकता है।

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