Maratha Empire का इतिहास – शिवाजी महाराज से पेशवाओं तक

भारत का इतिहास अनेक वीरों और साम्राज्यों से भरा पड़ा है, जिनमें से सबसे गौरवशाली साम्राज्यों में से एक था Maratha Empire। यह केवल एक राजनीतिक सत्ता नहीं बल्कि स्वतंत्रता, स्वाभिमान और रणनीति का प्रतीक था। मराठा साम्राज्य की नींव छत्रपति शिवाजी महाराज ने 17वीं शताब्दी में रखी, जब पूरा भारत मुगल साम्राज्य के प्रभाव में था। महाराष्ट्र के एक छोटे से क्षेत्र से उठकर यह साम्राज्य पूरे भारत की दिशा बदलने वाला साबित हुआ।

मराठा साम्राज्य की स्थापना
Maratha Empire की स्थापना 1674 ईस्वी में हुई जब शिवाजी महाराज ने रायगढ़ किले पर राज्याभिषेक किया। शिवाजी महाराज ने अपनी बुद्धिमत्ता, साहस और रणनीति से मुगल साम्राज्य की नींव हिला दी। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध नीति (Guerrilla Warfare) का प्रयोग किया जो पहाड़ी क्षेत्रों में बेहद प्रभावी सिद्ध हुई। शिवाजी ने प्रशासनिक ढांचे को मजबूत किया और अष्टप्रधान परिषद का गठन किया, जिसमें आठ मंत्री राज्य के विभिन्न कार्यों का संचालन करते थे।

शिवाजी महाराज का शासन और नीतियाँ
शिवाजी महाराज ने जनता के कल्याण पर आधारित शासन प्रणाली विकसित की। उन्होंने धर्म, जाति और भाषा के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया। उनका प्रशासन न्यायप्रिय और सशक्त था। उन्होंने नौसेना की स्थापना करके समुद्री मार्गों पर डच, पुर्तगाली और अंग्रेज़ शक्तियों को चुनौती दी। इस कारण उन्हें भारत का पहला नौसेना निर्माता भी कहा जाता है।

Maratha Empire और मुगलों का संघर्ष
Maratha Empire और मुगल साम्राज्य के बीच लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा। औरंगजेब ने मराठों को समाप्त करने के लिए 25 वर्षों तक दक्षिण भारत में अभियान चलाया, लेकिन मराठों की गुरिल्ला युद्ध रणनीति ने उसे थका दिया। शिवाजी के बाद उनके पुत्र संभाजी महाराज ने मुगलों के खिलाफ वीरता से युद्ध किया, हालांकि वे अंततः मुगलों के हाथों पकड़े गए और वीरगति को प्राप्त हुए।

पेशवाओं का दौर
शिवाजी के बाद Maratha Empire की कमान पेशवाओं के हाथ में आई। बालाजी विश्वनाथ, बाजीराव प्रथम, नानासाहेब पेशवा जैसे नेताओं ने इस साम्राज्य को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। बाजीराव प्रथम का काल Maratha Empire का स्वर्ण युग माना जाता है। उनकी युद्ध नीति, संगठन क्षमता और तेज निर्णय लेने की क्षमता के कारण मराठों ने उत्तर भारत तक अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था।

तीसरा पानीपत का युद्ध
1761 में Maratha Empire और अहमद शाह अब्दाली के बीच तीसरा पानीपत का युद्ध हुआ। यह युद्ध भारतीय इतिहास के सबसे बड़े युद्धों में से एक था। हालांकि मराठों ने बहादुरी से युद्ध किया, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद भी मराठों ने हार नहीं मानी और आने वाले वर्षों में उन्होंने अपनी शक्ति को फिर से संगठित किया।

मराठा साम्राज्य का पतन
18वीं शताब्दी के अंत तक अंग्रेज भारत में एक नई शक्ति के रूप में उभर चुके थे। मराठों और अंग्रेजों के बीच तीन बड़े युद्ध हुए जिन्हें एंग्लो-माराठा युद्ध कहा जाता है। अंततः 1818 में बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण किया और Maratha Empire का अंत हो गया। हालांकि यह साम्राज्य समाप्त हुआ, लेकिन इसकी विरासत आज भी भारतीय इतिहास के सबसे गौरवशाली अध्यायों में गिनी जाती है।

निष्कर्ष
Maratha Empire भारतीय इतिहास में स्वतंत्रता, संगठन और आत्मगौरव का प्रतीक था। छत्रपति शिवाजी महाराज ने यह दिखाया कि यदि दृढ़ संकल्प और सही नेतृत्व हो, तो कोई भी ताकत स्वतंत्रता की भावना को दबा नहीं सकती। पेशवाओं ने इसे एक शक्तिशाली साम्राज्य में बदल दिया जो उत्तर से लेकर दक्षिण तक फैला था। मराठों की वीरता और संगठन क्षमता ने भारतीय इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया।

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